मन का रचा सब खेल
नई दिल्ली, अगस्त 19 -- किसी साधक ने सवाल किया है कि क्या वाकई यह जगत स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है? स्वप्न जब तक रहे, तब तक उसे सत्य मानने में क्या गलती है? आप पूर्णतया असंभव घटना स्वप्न में देखते ही हो। उदाहरण के लिए, आप किसी मृत व्यक्ति से आनंद से बात करते हो और शायद संदेह भी करते हो कि क्या यह तो मर नहीं गया था? तब भी किसी तरह आपके मन का स्वप्न दृश्य से पूरा मेल हो जाता है और वह व्यक्ति स्वप्न-प्रयोजन की दृष्टि से जीवित ही लगता है। अर्थात स्वप्न, स्वप्न की हैसियत से आपको उसकी सत्यता के बारे में संदेह करने की गुंजाइश नहीं रहने देता। जाग्रत में भी ऐसा ही होता है। जब तक आप जाग्रत अवस्था में रहें, तब तक जिसे आप देखते हैं, उस जगत की सत्यता के विषय में संदेह करने के लिए आप समर्थ नहीं हैं। जिसने स्वयं जगत की सृष्टि की है, वह मन उसकी असत्यता का ...
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