लखनऊ, फरवरी 23 -- भारतीय ज्ञान-परम्परा एक सर्वांगपूर्ण जीवन-विधान का गुण-सूत्र है। इसमें जीवन जीने की सार्थक, सुव्यवस्थित और तार्किक प्रणाली सिद्धांत के साथ-साथ व्यवहार में भी प्रतिध्वनित होती है। यहां जानने की सार्थकता होने में देखी जाती है, इसीलिए यहां मन, वचन और कर्म की एकता पर बहुत बल दिया गया है। मन, वचन और कर्म की इस एकता का खण्डित होना ही पाखण्ड कहलाता है। ये बातें मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय संस्कृत अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर रामनाथ झा ने कहीं। प्रोफेसर झा भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय स्थित जयशंकर प्रसाद सभागार में कुमारस्वामी फाउण्डेशन की ओर से हुई 20 वें पंडित भुवनेशचन्द्र मिश्र स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजनीतिशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर आरके मिश...
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