कन्नौज, अप्रैल 23 -- नगर के पूर्वी बाईपास पर रहने वाले अनिल श्रीवास्तव पिछले सात वर्षों से लाठी बनाने का काम कर रहे हैं। इस परंपरागत काम में उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, खासकर इन दिनों पड़ रही भीषण गर्मी में। सुलगती भट्ठी में टेढ़े-मेढ़े बांस को तपाकर सीधा करना बेहद कठिन और जोखिम भरा होता है। लाठी बनाने के लिए मुख्य रूप से बांस का उपयोग किया जाता है, जो अधिकतर झारखंड से मंगाया जाता है, जबकि स्थानीय स्तर पर इसकी उपलब्धता काफी कम है। अनिल बताते हैं कि कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत के बावजूद उन्हें मेहनत के अनुरूप उचित दाम नहीं मिल पाता। उनकी बनाई लाठियों की बिक्री भी नियमित नहीं है। अधिकतर बिक्री मेलों और खास अवसरों पर ही होती है, जबकि फुटकर ग्राहक बहुत कम आते हैं। क्षेत्र में लाठी के लिए कोई स्थायी बाजार या मंडी न होने से कारीगरों को ...