नई दिल्ली, जनवरी 16 -- प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भगवान के प्रति प्रेम कोई दिखावा नहीं, कोई रस्म नहीं, बल्कि हृदय की गहराई से निकलने वाली अनन्य ममता है। यह प्रेम वह है जिसमें साधक अपने आराध्य में पूरी तरह लीन हो जाता है। महाराज जी का मूल संदेश है - 'अपने आराध्य देव में अनन्य ममतामय हो जाना ही ईश्वर को पाना है।' जब प्रेम इतना गहरा हो जाता है कि साधक में 'मैं' और 'मेरा' का भाव मिट जाता है, तब वही सच्चा प्रेम है। आइए प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचनों से समझते हैं कि भगवान के प्रति प्रेम कैसा होना चाहिए।अनन्य ममता ही सच्चा प्रेम है महाराज जी बार-बार कहते हैं कि भगवान के प्रति प्रेम अनन्य होना चाहिए। अनन्य का अर्थ है कि बिना किसी अन्य के साथ मिलावट के। जब साधक का मन केवल अपने आराध्य में ही रम जाता है, जब वह दुनिया की हर चीज को भगवान का ही र...