भागलपुर, जनवरी 25 -- -प्रस्तुति : विजय झा मिथिला क्षेत्र की पहचान सदियों से पग-पग पोखर, माछ-मखान के रूप में रही है। यह कहावत इस बात का प्रतीक रही है कि यहां का जीवन जल, प्रकृति और परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। गांव-गांव में फैले असंख्य तालाब केवल जल संग्रहण का माध्यम नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी माने जाते थे। सुबह से लेकर शाम तक लोगों की दिनचर्या तालाब के आसपास ही घूमती थी। महिलाएं पानी भरने आती थीं, बच्चे तैरना सीखते थे, बुजुर्ग घाट पर बैठकर चर्चा करते थे और पशु-पक्षी अपनी प्यास बुझाते थे। पूर्व काल में तालाब खुदवाना सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ था। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार सार्वजनिक उपयोग के लिए तालाब बनवाते थे। यह समाज सेवा का बड़ा माध्यम माना जाता था। ग्रामीण जीवन में तालाब के बिना जीवन की कल्पना भी कठिन मानी जाती थी...