फिरोजाबाद, मार्च 1 -- बुजुर्गों का कहना है कि 1980-90 के दशक में ढोल मजीरों के साथ गाए जाने वाले फाग अब केवल यादों में सिमट रहे हैं। पहले होली का पर्व कई दिन पहले शुरू हो जाता था। गांव-गांव ढोलक और मजीरों की धुन पर देर रात तक फाग गायन होता था। उस जमाने में गांव में भले ही किसी व्यक्ति की रंजिश होती थी लेकिन होली पर सभी एक साथ मिलकर होली खेलते थे। उस समय लोगों में मनमुटाव भी कम थे। मगर समय के साथ-साथ आधुनिक, डिजिटल मनोरंजन और ग्रामीण संस्कृति के प्रति कम होती रुचि के कारण यह पांरपरिक धरोहर विलुप्त हो रही है। आपसी मनमुटाव के चलते अब यह परंपरा सिमटती जा रही है। होली के रंगों का उल्लास बगैर फाग और गीतों के अधूरा लगता है, लेकिन आज युवाओं के बीच म्यूजिक सिस्टम पर फिल्मी गीत गूंजते हैं। तेज आवाज में गूंजते इन गीतों में म्यूजिक तो होता है, मगर पह...