नई दिल्ली, सितम्बर 25 -- यह खेद की बात है कि संस्कार के युग में व्यभिचार का दौर चल गया। खेद है कि समता पर आधारित हमारे भारत राष्ट्र में, असम्माननीय कर्म चलन-सा बनता जा रहा। खेद यह भी है कि जो बालिका साइकिल पर बैठ स्कूल चल पड़ी थी, उसी को दरिंदों ने समूह बनाकर अपना निशाना बनाया। उसे कभी न भूलने वाली पीड़ा दे दी। सन् 1985 में भारतीय रेल के साधारण दर्जे में बाबूजी (बैद्यनाथ पांडेय) की धोती की कोर पकड़े मैं भी लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्रा बनी थी। बस एक ही उम्मीद थी मेरी और बाबूजी की भी कि खूब पढ़ूं, खूब लिखूं और जीवन में कुछ बनूं। हर हफ्ते मां पोस्टकार्ड पर अपनी भावनाएं दर्ज कर पोस्ट बॉक्स में डाला करतीं। कॉलेज में दोपहर के भोजनावकाश के समय डाकिया खादी की थैली लेकर आता और मैं इस उम्मीद में टकटकी बांधे रहती कि मां के कुछ शब्द पढ़ने को मिल जाएं...