नई दिल्ली, जनवरी 28 -- बुद्ध एक नदी के किनारे से गुजर रहे हैं। कुछ बच्चे खेल रहे हैं। बुद्ध रुककर उन्हें देखने लग जाते हैं। बच्चों ने रेत के घर बनाए हैं। वे लड़ रहे हैं आपस में। कोई कहता है, यह मेरा है। दूसरा कहता है, यह तेरा है, तो दूर रख। अपने मकान को मेरे मकान के करीब मत ला। अपने-अपने रेत के मकान की चारों ओर उन्होंने रेखाएं खींच रखी हैं कि यह मेरा आंगन है, यह मेरा बगीचा है, यह मेरी सीमा है; इसके भीतर कोई न आए। फिर भी बच्चे तो बच्चे हैं। एक बच्चे का पैर किसी के मकान पर पड़ गया, तो वह उसकी छाती पर चढ़ बैठा और उसने बाकी को भी पुकारा- भाइयो, तुम भी आओ और इसको दुरुस्त करो, इसको राह पर लाओ। बाकी भी आ गए। न्याय का सवाल है। फिर उन्हें अपना मकान भी बचाना था। सबने मिलकर उस लड़के की खूब मरम्मत की। सांझ हो गई, तो किसी ने जोर से आवाज दी, बच्चो, अब ...
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