बांका, जनवरी 6 -- बांका, वरीय संवाददाता। बांका जिला कभी अपनी छोटी-बड़ी नदियों, नालों और जलस्रोतों के लिए जाना जाता था। चांदन, ओढ़नी, बदुआ, चीर, सुखनियां जैसी नदियां न सिर्फ सिंचाई का आधार थीं, बल्कि पूरे इलाके की जैव विविधता और जलवायु संतुलन को भी बनाए रखती थीं। लेकिन बीते वर्षों में लगातार दोहन, अवैज्ञानिक बालू उठाव, अतिक्रमण और वर्षा के पैटर्न में बदलाव के कारण ये नदियां सिकुड़ती चली गईं। कभी ये बहती नदियों और हरे-भरे तटों के कारण जाना जाता था। आज हालात यह हैं कि ये नदियां बरसात के एक दो महीनों को छोड़ दें तो लगभग सूखी नजर आती हैं। इसका असर अब प्रकृति तक सीमित नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। स्थानीय मछुआरों के अनुसार, पहले इन नदियों में रोहू, कतला, मृगल, पाबड़ा, सिंघी, टेंगर जैसी कई प्रजातियों की मछलियां प्रचुर मात...