नई दिल्ली, अप्रैल 15 -- बद्री नारायण, कुलपति, टीआईएसएस, मुंबई किसी भी देश या समाज के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य-पुस्तकें वस्तुतः उसके समाज का आईना होती हैं। जब विकास, आधुनिकता और नए परिवर्तनों के कारण समाज बदलते हैं, तब नई किताबों की जरूरत होती है। पाठ्य-पुस्तकें ऐसी होनी चाहिए, जो सामाजिक सच्चाइयों, उनकी गतिशीलता को उनके अंतर्विरोधों व जटिलताओं के संदर्भ में समझाएं। इसके साथ ही बाल व किशोर मन के लिए सरल, सहज, आकर्षक व आहत न होने वाले ज्ञान को इनमें जगह दी जानी चाहिए। पाठय-पुस्तकों को लेकर द्वंद्व न केवल भारत में, बल्कि यूनान, जापान, ऑस्ट्रिया, अमेरिका, रोम, स्पेन जैसे कई मुल्कों में उठते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर विवाद राष्ट्रीय अस्मिताओं के विश्लेषण, राष्ट्रीय इतिहास व समाज-विमर्श में समुदायों के चित्रण के तरीके, उनको जगह जैसे म...