संतकबीरनगर, मार्च 2 -- संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले के माह-ए-रमजान का नाम आते ही बड़े-बुजुर्गों के साथ-साथ बच्चों के चेहरे पर भी अलग सी चमक आ जाती है। बचपन का रमजान सिर्फ रोज़ा रखने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह एक मुकम्मल तहज़ीबी व रूहानी तजुर्बा बनकर दिलो-दिमाग में बस जाता है। सहरी के वक्त मां का धीमी आवाज में जगाना, घर में बर्तनों की हल्की खनखनाहट व मस्जिदों से उठती अज़ान की सदा- ये सब मिलकर एक खास माहौल तैयार करते हैं, जो साल भर इंतजार कराता है। माह-ए-रमजान में बचपन में रखा गया पहला रोज़ा किसी उपलब्धि से कम नहीं होता। परिवार के लोग हौसला बढ़ाते हैं। दादा-दादी दुआएं देते हैं। शाम को इफ्तार की थाली में बच्चे की पसंद का खास इंतजाम होता है। खजूर, फल व पकवानों से सजी दस्तरखान सिर्फ खाने का जरिया नहीं, बल्कि सब्र व शुक्र का स...