नई दिल्ली, मई 12 -- सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि अगर किसी निजी घर की चारदीवारी के भीतर और बाहरी लोगों की गैरमौजूदगी में जातिसूचक शब्द कहे जाते हैं, तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस पीके मिश्रा की बेंच ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज होने के लिए यह बेहद जरूरी शर्त है कि कथित अपमान या गाली-गलौज 'सार्वजनिक रूप से' यानी पब्लिक व्यू में हुई हो।क्या है 'पब्लिक व्यू' का दायरा? बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 'पब्लिक व्यू' के दायरे में आने के लिए उस जगह का ऐसा होना जरूरी है, जहां आम लोग मौजूद हों या जहां वे आरोपी की बातों को सुन और देख सकें। ...
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