नई दिल्ली, सितम्बर 12 -- जब इंसान अपनी जिंदगी के बाइस-तेईसवें साल में होता है तो आंखों में कई सपने तैर रहे होते हैं। आरुषि शर्मा भी अपने इंजीनियरिंग के चौथे साल में थीं। प्लेसमेंट का दौर करीब था और उनके बैच के ज्यादातर दोस्त कॉर्पोरेट जगत में कदम रखने की तैयारी में जुटे थे। उस वक्त सिविल सर्विस आरुषि के दिमाग में दूर-दूर तक नहीं था। सच कहें तो उन्होंने पक्का मन बना लिया था कि उन्हें इस तरफ जाना ही नहीं है। लेकिन जिंदगी अक्सर वहां ले जाती है, जहां का हमने कभी सोचा नहीं होता। यह खयाल उनके पिता की तरफ से आया था। उन्होंने आरुषि को बड़े प्यार से समझाया कि कम से कम इस विकल्प पर एक बार सोच कर तो देखो। शुरुआत में आरुषि ने इस आइडिया को सिरे से नकार दिया। लेकिन धीरे-धीरे यह सवाल उनके जेहन में घर करने लगा कि आखिर आने वाले दशकों में किस तरह की जिंदगी...