नई दिल्ली, जुलाई 25 -- केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद से कॉकरोच लौट चले हैं। अपने सफल आंदोलन से उन्होंने भारतीय राजनीति के उन पुराने दिनाें की याद दिला दी है, जब छात्र सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि जोर-जुल्म के प्रमुख प्रतिरोधक तत्व हुआ करते थे। इन नौजवानों ने साबित कर दिखाया है कि वे भीड़ का हिस्सा नहीं, बल्कि ऐसा सैलाब हैं, जो बहुत कुछ बदलने की क्षमता रखता है। यह आंदोलन कई सवाल छोड़कर रुखसत हो रहा है। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि नई उमर की नई फसल के लिए सबसे जरूरी इस मुद्दे का स्थायी समाधान क्या है? जवाब आसान नहीं है। इस समस्या की कई अभेद्य परतें हैं। अपनी बात समझाने के लिए मैं आपको पांच दशक पीछे ले चलना चाहूंगा। वह 1975 की आती गर्मियां थीं। मैं मैनपुरी शहर के बीचोबीच स्थित एक इंटर कॉलेज में बोर्ड का पहला इम्ति...