नई दिल्ली, नवम्बर 9 -- नई दिल्ली, का.सं.। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पॉक्सो अधिनियम के एक मामले में नाबालिग पीड़िता की सहमति को निरर्थक मानते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र के मामलों में सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता और पीड़िता का बयान ही निर्णायक होता है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने साल 2017 के एक मामले में आरोपी रसूल आजम की अपील खारिज कर दी। ट्रायल कोर्ट ने उसे नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म का दोषी ठहराया था। कोर्ट ने माना कि स्कूल रिकॉर्ड और पिता के हलफनामे से साबित हुआ है कि लड़की की उम्र घटना के वक्त 14 वर्ष थी। अदालत ने कहा कि स्कूल का एडमिशन-विदड्रॉल रजिस्टर उम्र निर्धारण के लिए विश्वसनीय दस्तावेज है। मामला रणहोला थाना क्षेत्र का है। पीड़िता के पिता ने शिकायत में बत...
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