मेरठ, दिसम्बर 16 -- 'चांदनी छिपी छिपी जइहौं अटरिया, दिन की बैरन सास ननंदिया' लोकगीत में मिलन-विरह की वेदना केवल काल्पनिक नहीं है। आप सोचिए कि विवाह के बाद बेटी ससुराल आई और ताउम्र अपने घर, खेत, पनघट और तालाब ना देख पाई हो। बेटी की इसी वेदना को अमीर खुसरो ने 'कहो को ब्याहे बिदेश। भैया को दियो बाबुल महले दो-महले, हमको दियो परदेस' से बयां किया। आज युवा पीढ़ी सबकुछ छोटी उम्र में पा लेती है। रिश्तों में विश्वास नहीं है। प्रेम की रक्षा करनी पड़ती है। प्रेम में पाना छोड़ना होगा। पूरा जीवन एक पाठशाला है। युवा किताबें पढ़ें। 'चंदन किवाड़' की लेखिका एवं लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने सोमवार को साहित्यिक सांस्कृतिक परिषद द्वारा सीसीएसयू कैंपस के अटल सभागार में लोकगीत और लोक कथाओं में सतत बह रहे प्रेम, विरह, सुख-दुख के भावों को कुछ इसी अंदाज में...
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