अलीगढ़, जनवरी 15 -- (प्रस्तुति: सुर्दशन सोनी, गोपाल बाबू, विनय पाठक, मयंक जैन, राजेन्द्र चौधरी, सिद्धार्थ भारद्वाज) अलीगढ़। हड्डियों को जमा देने वाली ठंड की रात, जब शहर का हर नागरिक अपने गर्म बिस्तरों और हीटरों के आराम में दुबका होता है, तब कुछ जिंदगियां ऐसी भी होती हैं। जिनके लिए यह रात केवल एक लंबी, ठंडी परीक्षा होती है, पेट भरने की जद्दोजहद की परीक्षा। जनवरी की कंपकंपाती रात में, फुटपाथों और फ्लाईओवर के नीचे की दुनिया की तस्वीर बिल्कुल अलग होती है। सर्द हवाएं चाबुक की तरह चलती हैं और खुले आसमान के नीचे फटे-पुराने कंबलों या जूट की बोरियों में लिपटे लोगों के लिए, गरमाहट की हर एक सांस संघर्ष होती है। ऐसे मजबूर लोगों के लिए सर्दी, गर्मी, बरसात कोई मायने नहीं रखती है। रिक्शा, ऑटो चलाने वाले व मजदूरों को यही आस रहती है कि चार पैसे कमा लें तो...
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