नई दिल्ली, फरवरी 7 -- दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने वाले व सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को समाज या माता-पिता की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। उच्च न्यायालय कहा कि न ही कोई व्यक्ति या संस्था उनके इस निर्णय में दखल दे सकती है।जीवनसाथी चुनने का अधिकार न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि सहमति से विवाह करने का निर्णय पूरी तरह पवित्र है। ऐसे निर्णय को सम्मान दिया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब दोनों व्यक्ति वयस्क हों और उन्हें अपने जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो। पीठ ने दोहराया कि विवाह करने का अधिकार मानवीय स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है। यह अधिकार न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी...
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