नई दिल्ली, जून 23 -- अश्विनी महापात्रा, प्रोफेसर, जेएनयू स्विट्जरलैंड में 14-सूत्रीय सहमति-पत्र के आधार पर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति-वार्ता का नतीजा चाहे जो भी हो, तीन महीने तक चले खूनी संघर्ष ने भारत को अपनी पश्चिम एशिया नीति की समीक्षा का मौका दिया है। यह आकलन इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि भारत अपनी सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति के लिए 80 प्रतिशत से ज्यादा इसी क्षेत्र पर निर्भर है, और वहां 90 लाख से ज्यादा भारतीय रहते व काम करते हैं, जो कुल मिलाकर हर साल 51 अरब डॉलर भेजते हैं। इस संघर्ष के समुद्री सुरक्षा संबंधी व आर्थिक असर ने, खासकर 'होर्मुज जलमार्ग' के बंद होने से ऊर्जा की बढ़ी कीमतों को देखते हुए, विश्लेषकों के बीच 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति पर बहस छेड़ दी है। कई लोगों ने जहां संबंधों में संतुलन बनाने में नीतिगत विफलता को उजागर किया है, त...