किशनगंज, मार्च 1 -- ठाकुरगंज। निज संवाददाता कभी रंगों का पर्व होली सामाजिक समरसता, भाईचारे और लोकसंस्कृति की जीवंत मिसाल हुआ करता था। ठाकुरगंज और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में एक माह पूर्व से ही फाग गीतों की गूंज चौपालों और मंदिरों तक सुनाई देती थी। गांव के बुजुर्गों और युवाओं की टोलियां शाम ढ़लते ही चौपाल पर जुटतीं और पारंपरिक फगुआ गाकर वातावरण को रंगीन बना देती थीं। होली से एक सप्ताह पहले से ही होली मिलन समारोहों का दौर शुरू हो जाता था। लोग एक-दूसरे के घर पहुंचकर गले मिलते, अबीर-गुलाल लगाते और रिश्तों में मिठास घोलते। होली के एक दिन पूर्व सार्वजनिक स्थानों पर "धुर खेल" का आयोजन होता था, जिसमें गांव के बच्चे और युवा बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। होली के दिन खासकर युवा वर्ग टोली बनाकर जोगिरा गाते हुए पूरे गांव का भ्रमण करता था। बच्चे बड़ों के चरणों...