नई दिल्ली, फरवरी 23 -- कमलेश जैन,अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में बलात्कार के एक मामले में आए फैसले से स्वाभाविक ही संवेदनशील तबकों और मानवाधिकार के हिमायती लोगों में नाराजगी फैल गई है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को कम करते हुए कहा कि वास्तविक बलात्कार और बलात्कार की कोशिश में फर्क है। 'जननांग के अंदर स्खलन' पर ही वास्तविक बलात्कार माना जाएगा। निस्संदेह, ऐसी टिप्पणी समाज पर गहरा असर डालती है। यह न सिर्फ क्रूर मानसिकता वालों को उकसाती है, बल्कि सामाजिक समानता के मूल्य पर भी चोट करती है। आज भी अदालतों से ऐसी टिप्पणी आखिर क्यों आती है? इसकी दो बड़ी वजहें समझ में आ रही हैं। पहली, साल 2013 तक भारतीय दंड संहिता की धारा 375 का अर्थ काफी संकुचित था। पहले छूने, टटोलने, नग्न करने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं गि...