नई दिल्ली, अप्रैल 1 -- भारत ने लंबे समय तक जिस आंतरिक चुनौती का सामना किया, वह नक्सलवाद के रूप में देश के अनेक हिस्सों में फैली रही। यह समस्या केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसने सामाजिक, आर्थिक और मानवीय जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। दशकों तक आदिवासी क्षेत्रों में भय, असुरक्षा और पिछड़ापन बना रहा। आज जब देश नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में कदम बढ़ा चुका है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस परिवर्तन के पीछे की नीति, संकल्प और प्रयासों को समझा जाए। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में बीते वर्षों में जो रणनीति अपनाई गई, वह बहुआयामी रही। केवल सुरक्षा बलों की तैनाती तक सीमित न रहकर सरकार ने विकास और विश्वास, दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक की आवाज गूंजा करती थी, वहां आज स्कूल खुल रहे हैं,...
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