लखनऊ, जून 22 -- नियाज़ तौहीद सिद्दीक़ी। अम्बेडकरनगर। सिर पर पगड़ी, हाथ में लाठी और गांव की तंग गलियों में पैनी नज़र रखता एक इंसान - यही है हमारे गांव का चौकीदार। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से खून में उतरी एक ज़िम्मेदारी है। जब रात के सन्नाटे में पूरा गांव नींद की आगोश में होता है, तब भी यह प्रहरी जागता है । ठंड हो, बारिश हो या तूफान। गांव की सुरक्षा, शांति और व्यवस्था की नींव इन्हीं कंधों पर टिकी होती है। वक्त के साथ इन्हें कभी विलेज गार्ड,कभी चौकीदार तो कभी ग्राम प्रहरी कहा गया। लेकिन सिर्फ नाम बदला हालात जस के तस रहे। डेढ़ सदी की सेवा, डेढ़ सदी की उपेक्षा

चौकीदार की कठिनाइयां जिस चौकीदार की सीटी की तीखी आवाज़ सुनकर गांव के बच्चे-बूढ़े सतर्क हो जाते थे, जिसकी मौजूदगी मात्र से अपराधियों के हौसले टूट जाते थे, आज वही चौकीदार खु...