बागपत, अगस्त 10 -- बड़ौत। अजितनाथ सभागार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य भगवंत श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ने कहा कि ध्यान की सबसे बड़ी उत्कृष्टता सामायिक है। सामायिक आत्मचिंतन, समता और आत्मशुद्धि की श्रेष्ठ साधना है। आचार्य आर्जव सागर ने श्रद्धालुओं को सामायिक की विधि, नियम और आध्यात्मिक महत्व की जानकारी देते हुए कहा कि सामायिक के दौरान व्यक्ति सांसारिक राग-द्वेष से दूर होकर आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होता है। मन को एकाग्र रखते हुए धर्मध्यान और आत्मचिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामायिक के समय शरीर को स्थिर, मन को शांत और वाणी को संयमित रखना चाहिए। आलस्य, निद्रा और प्रमाद से बचते हुए सांसारिक विषयों से मन हटाकर जिनवाणी और धर्म के चिंतन में लगाना चाहिए। यह भी पढ़ें- Etah News: जैन धर्म का सबसे ताकतवर स्तोत्र है भक्तामर : आचार्यश्र...