सहारनपुर, अगस्त 14 -- मुल्क की आजादी की लड़ाई में देवबंद वासियों और दारुल उलूम के उलेमा के योगदान नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आजादी के मतवाले यहां भी हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। देश की आजादी की प्रथम लड़ाई 1857 की क्रांति को माना जाता है। हालांकि इस क्रांति के विफल होने पर फिरंगियों ने उलेमा सहित क्षेत्र के 40 शूरवीरों को देवबंद में फांसी के फंदे पर लटका दिया था। मुल्क की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने सरों का बलिदान करने वाले देवबंदी उलेमा ने अंग्रेजी सेना को शामली के ऐतिहासिक मैदान में नाको चने चबाने को मजबूर कर 1857 में क्रांति का बिगुल फूंका था। यह भी पढ़ें- आजादी के मतवाले : मैट्रिक की परीक्षा छोड़ डाकघर में लगा दी आग, थाने पर फहराया तिरंगाआजादी के लिए उलेमा का योगदान दारुल उलूम मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बताते ह...