दीपोत्सव का एक दशक: आस्था की रोशनी से कुम्हारों के हुनर और आजीविका को मिला नया बाजार
एचटी ब्रांड स्टूडियो, नवम्बर 3 -- सरयू के तट पर जब लाखों दीये एक साथ जगमगाते हैं, तो अयोध्या का दीपोत्सव आस्था और भव्यता का प्रतीक बन जाता है। लेकिन इन दीयों की रोशनी के पीछे उन कारीगरों की मेहनत भी होती है, जो कई सप्ताह पहले से मिट्टी तैयार करने, चाक पर दीये बनाने, उन्हें सुखाने और आयोजन तक पहुंचाने में जुट जाते हैं। दीपोत्सव के दसवें वर्ष में यह आयोजन केवल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि पारंपरिक कुम्हारी कला और उससे जुड़ी आजीविका का बड़ा माध्यम भी बनकर उभरा है। दीपावली पर दीप जलाने की परंपरा भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की मान्यता से जुड़ी है। मान्यता है कि उनके स्वागत में नगरवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। इसी स्मृति में दीपावली पर घरों और मंदिरों में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। अयोध्या में मौजूद...
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