नई दिल्ली, अगस्त 2 -- नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। देश में नेत्र प्रत्यारोपण का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन इसके बावजूद मौजूदा समय में जरूरत के अनुरूप आंखें दान में नहीं मिल पा रही हैं। हालत यह है कि जो आखें दान में मिलती है, उनमें से सिर्फ 60 फीसदी का ही इस्तेमाल होता है। बाकी, 40 फीसदी कॉर्नियां विभिन्न कारणों से बेकार हो जाती हैं। इंडियन जर्नल मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। देश में पहला नेत्र प्रत्यारोपण 1948 में चेन्नई में हुआ था। शुरुआत के तीन-चार दशकों में इस दिशा में बहुत ज्यादा प्रगति नहीं हुई। लेकिन, 90 के दशक के बाद भारत ने तेजी से आधुनिक नेत्र प्रत्यारोपण की दिशा में प्रगति की। मौजूदा समय में भारत में नेत्र प्रत्यारोपण की गुणवत्ता को अमेरिका के बाद दूसरे नंबर का माना जाता है। इसके अलावा एशिया...