शामली, मार्च 3 -- शहर के जैन धर्मशाला में आयोजित आध्यात्मिक शिविर के चौथे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए क्रांतिवीर मुनि प्रतीक सागर मुनिराज ने जैन दर्शन में दान और भैयावृत्ति के महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान और सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण और पर-कल्याण का श्रेष्ठ साधन हैं। मुनिराज ने दान की तुलना एक छोटे बीज से करते हुए कहा कि जैसे बीज समय आने पर विशाल वृक्ष बनकर असंख्य लोगों को छाया देता है, वैसे ही छोटा सा दान भी अनेक गुना फल प्रदान करता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक ग्लास दान देने पर हजार ग्लास के समान फल प्राप्त होता है। दान से व्यक्ति की आध्यात्मिक तिजोरी भरती है और उसे कई गुना प्रतिफल मिलता है। भैयावृत्ति अर्थात सेवा के महत्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि विशेष रूप से साधु...