नई दिल्ली, सितम्बर 14 -- एस श्रीनिवासन,वरिष्ठ पत्रकार साल 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर तेलंगाना वजूद में आया। उसी समय से इसकी राजनीति में अगड़ी जातियों का दबदबा रहा है। साक्षरता दर और स्कूल में दाखिले जैसी कुछ कसौटियों पर पिछड़ी जातियों, खासकर दलितों की स्थिति में सुधार हुआ है, पर सामाजिक सम्मान व सतत विकास में समुचित हिस्सेदारी दिलाने के मामले में अब भी इनके लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। पिछले सप्ताह तेलंगाना की राजनीति में एक शर्मनाक स्थिति सामने आई और यह सब तब हुआ, जब मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी सत्ता में अपने 1,000 दिन पूरे करने का जश्न मना रहे थे। मुख्य विपक्षी पार्टी, भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने इस जश्न में खलल डालने की कोशिश की, पर वह खुद एक अप्रिय स्थिति में फंस गई। दरअसल, 7 सितंबर को दो दर्जन से ज्यादा विधायक, एक दर्जन विध...