नई दिल्ली, जून 15 -- तृणमूल कांग्रेस का टूटना बदलती भारतीय राजनीति का एक ऐसा संकेत है, जिससे तमाम राजनेता सबक ले सकते हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों को अभी चालीस दिन ही पूरे हुए हैं और यह बात अब शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल कांग्रेस का स्वर्णिम दौर लद गया है। एक हारी हुई पार्टी को एकजुट रखने के जैसे प्रयास तृणमूल कांग्रेस कर सकती थी, उनका नितांत अभाव दिखा है। तृणमूल कांग्रेस के आला नेताओं ने साबित कर दिया कि उनमें जुड़ने-जोड़ने का हुनर कम है। वैसे, राज्य स्तर पर विधानसभा में भी पार्टी बंट चुकी है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट स्वरूप सामने नहीं आया है, जबकि पार्टी से अलग हुए 20 सांसदों की स्थिति स्पष्ट है। इन्होंने एक नए अल्प-चर्चित दल के नाम का सहारा लिया है। यह अलग तरह का दलबदल अपने आप में बहस का मुद्दा है। आम तौर पर राजनीतिक दल अ...