फतेहपुर, जून 6 -- फतेहपुर। ग्रामीण इलाकों में सरकारी हैंडपंप अब जनता की प्यास बुझाने के बजाय प्रधान और सचिवों की कमाई का जरिया बन चुके हैं। शुद्ध पानी के नाम पर हर साल करीब 4.36 करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कहीं दबंगों ने हैंडपंपों पर ताला जड़कर अपनी मोटरें डाल ली हैं तो कहीं फैक्ट्रियों के कचरे की वजह से हैंडपंप पीला और जहरीला केमिकल उगल रहे हैं। कागजों में लाखों रुपये खर्च कर मरम्मत और रिबोर का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन हकीकत में ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए तपती धूप में तीन-तीन किलोमीटर दूर से पानी ढोना पड़ रहा है। चार साल में फूंके 17 लाख, फिर भी आधी आबादी प्यासी

हाथगाम ब्लॉक की स्थिति हथगाम ब्लॉक की ग्राम पंचायत कोतला में पिछले चार वर्षों में शुद्ध पेयजल व्यवस्था पर करीब 17 लाख रुप...