संतकबीरनगर, दिसम्बर 9 -- संतकबीरनगर, निज संवाददाता। श्रीमद्भागवत में केवल भगवान ही प्रतिपाद्य हैं, भाग छह होते हैं। इसमें ज्ञान, वैराग्य, धर्म, ऐश्वर्य, यश और श्री। यह जिसमें नित्य निवास करते हैं उसको ही भगवान कहते हैं। उन्हीं भगवान का प्रतिपादक होने के कारण इस पुराण का नाम भागवत है। उक्त उद्गार सोमवार को भिटहा में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन सुनाते हुए कथा व्यास त्रिभुवन दास जी महाराज ने व्यक्त किया। कथा को आगे बढ़ाते हुए श्री दास जी महाराज ने कहा कि काल से अपवित्र भूमि, स्नान से शरीर, प्रक्षालन से वस्त्र, संस्कार से गर्भ, तपस्या से इंद्रियां, यज्ञ से ब्राह्मण, दान से धन, संतोष से मन और आत्मज्ञान से आत्मा की शुद्धि होती है। कथा को गति देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण अपनी...
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