मधुबनी, जनवरी 8 -- मधुबनी/बाबूबरही,हिटी। जिले के बाबूबरही,राजनगर,रहिका,झंझारपुर,अंधराठाढ़ी,मधेपुर,लदनियां सहित अन्य प्रखंडों के ग्रामीण इलाकों में नदियों और अन्य जलस्रोतों के सूखने से मछुआ समाज पर बीते कुछ दशकों में गहरा असर पड़ा है। कभी जिन नदियों और जलाशयों से सिंघाड़ा, मखाना, देसी कांटी, मांगुर, पोठिया, गैंची, झींगुर, बोआरी, कबई, सिंही जैसी अन्य देसी मछलियां सहजता से मिल जाती थी। फिलहाल वहां सन्नाटा पसरा रहता है। बुजुर्ग मछुआ भगलू सहनी, राम चंद्र सहनी, संजय सहनी व अन्य लोगों ने बताया कि पहले नदी सिर्फ मछली का ही स्रोत नहीं था, बल्कि दूसरे समुदायों की पूरी अर्थव्यवस्था इन्हीं पर निर्भर होती थी। मछुआरे मछली पकड़ते थे। जाल बुनने वाले कारीगरों को रोजगार मिलते थे। धोबी समाज नदी किनारे कपड़े धोते थे। नाविकों की नावें दिनभर चलती थी। पर आलम ये...
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