संतकबीरनगर, अप्रैल 6 -- बघौली, हिन्दुस्तान संवाद। कंधों पर जरूरत से ज्यादा भारी बोरा, पैरों में चप्पल तक नहीं और आंखों में थकान लिए सड़क किनारे कचरा बीनते मासूम चेहरे व्यवस्था की असल तस्वीर बयान कर रहे हैं। जिन नन्हें हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, उन्हीं हाथों से ये बच्चे प्लास्टिक और कबाड़ बीनते नजर आ रहे हैं। यह दृश्य केवल एक जगह का नहीं, बल्कि जिले के कई इलाकों में अक्सर मिल जाता है।सुबह से लेकर दोपहर तक ये बच्चे सड़कों, बाजारों और कूड़ाघरों के आसपास भटकते रहते हैं। कड़ी धूप और वाहनों के बीच जान जोखिम में डालकर ये कबाड़ इकट्ठा करते हैं, जिसे बेचकर दिन भर की मामूली कमाई हो पाती है। कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ इनके कंधों पर साफ नजर आता है।सरकारी स्तर पर हर बच्चे को शिक्षा का नारा दिया जाता है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। ...