पटना, जनवरी 30 -- भाकपा माले ने कहा कि जाति और नस्लीय भेदभाव कोई मनगढ़ंत अवधारणा या बीती बात नहीं हैं। वे हमारे शैक्षणिक संस्थानों और पूरे समाज में रोजमर्रे की क्रूर सच्चाई है। शुक्रवार को जारी बयान में पार्टी की ओर से सवाल उठाया गया कि क्या 'जातिविहीन समाज' बोल देने भर से रोहित वेमुला और डॉ. पायल तड़वी की संस्थागत हत्या या एंजेल चकमा की नस्लीय हत्याओं के विरुद्ध न्याय मिल जायेगा? सुप्रीम कोर्ट ऐसा क्यों मानता है कि जातिगत अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष, या उस संघर्ष से पैदा हुए ऐसे कानूनी उपाय जो जाति और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाजों को मजबूत करते हैं, देश को पीछे धकेल रहे हैं?
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