नई दिल्ली, सितम्बर 15 -- महान कवि दुष्यंत कुमार की एक पंक्ति है कि कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता है, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यार। इसका मतलब है कि अगर कोई काम असंभव लगे और उसे करने लिए अगर सच्ची लगन और पूरी मेहनत से लगातार प्रयास किया जाए, तो काम संभव हो सकता है। इस कहावत का बिल्कुल सही उदाहरण है आंध्र प्रदेश के रहने वाले जामी सिम्हाचलम नायडू की कहानी। इनकी कहानी हिम्मत और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। बता दें कि जामी जन्म से ही दिव्यांग है। दोनों हाथों और एक पैर में दिव्यांगता होने के बावजूद उन्होंने इसे कभी अपनी पढ़ाई और करियर की राह में बाधा नहीं बनने दिया। बचपन में जिन पैरों से उन्होंने लिखना सीखा, आज उन्हीं पैरों से वह सरकारी स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर बच्चों को पढ़ाते हैं। जी हां, वो एक सरकारी टीचर हैं। सरकारी शिक्षक बनने के...