नवादा, अक्टूबर 29 -- नवादा, हिन्दुस्तान संवाददाता। चुनावी वादे किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला होते हैं, जो मतदाताओं को राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों से जोड़ते हैं। ये वादे नागरिकों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को दर्शाते हैं। हालांकि, दशकों से भारतीय राजनीति में चुनावी घोषणापत्रों और प्रचार के दौरान किए गए आश्वासनों की पूर्ति एक बड़ा सवाल बनी हुई है। अक्सर ये देखा जाता है कि वादे चुनाव जीतने का एक माध्यम बन जाते हैं और सत्ता में आने के बाद उनकी प्रासंगिकता कम हो जाती है। यह प्रवृत्ति न केवल मतदाताओं के भरोसे को तोड़ती है, बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति उदासीनता भी पैदा करती है। चुनावी वादों की विश्वसनीयता का सीधा असर सुशासन और नागरिकों के सशक्तीकरण पर पड़ता है। आपके अपने अखबार की ओर से कौआकोल में आयोजित वन मिनट संवाद में ये बातें प्रबुद्धजन...