नई दिल्ली, अक्टूबर 31 -- इतिहास के संयोग कैसी त्रासदी जनते हैं? वह 1962 की अक्तूबर-नवंबर थी, जब लाल सैनिक पूर्वोत्तर की हमारी सीमा में घुस आए थे। भीषण जंग में भारत को हताशा का सामना करना पड़ा था। आज 64 बरस बाद पूर्वोत्तर में तथाकथित घुसपैठ को लेकर माहौल गरमाने की कोशिशें जारी हैं। सीमाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार स्थिति साफ कर चुकी है, लेकिन सोशल मीडिया के अदृश्य सुपारी किलर और विपक्ष नाखुशी जाहिर कर रहा है। तब और अब में अंतर मात्र इतना है कि 1962 में हंगामा खड़ा करने वालों के सियासी वंशज आज हुकूमत में हैं और तब के हुक्मरानों के वारिस विपक्ष की कतारों को आबाद कर रहे हैं। समय के साथ देश बदल गया, दुनिया बदल गई, पर हमारे राजनीतिज्ञ उस अनुपात में क्यों नहीं बदले? इन संघर्ष-कथाओं से इतर एक और सच है, जिसे दरकिनार करना नामुमकिन है। हम दीवाली पर जो ...