नई दिल्ली, जनवरी 3 -- असंख्य ऐसे इंसान होते हैं, जिनकी जिंदगी में रात कभी नहीं ढलती। हमेशा अंधेरा छाया रहता है। उस 12 वर्षीय बालक का भी यही हाल था। वह टटोलते हुए ही सब कुछ करता था। उसकी पढ़ाई भी सिर्फ थोड़ा टटोलने और कुछ समझ जाने तक महदूद थी, लिखने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था। वह बीते दो वर्ष से पेरिस में दृष्टिबाधित बच्चों के विशेष स्कूल 'रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ' में पढ़ रहा था। पढ़ाई तो नाममात्र की थी, क्योंकि उभरे अक्षरों वाली किताबें न के बराबर थीं। ऐसे बच्चों को कोई न कोई काम सिखा दिया जाता था, ताकि जिंदगी कट जाए। उस बालक को भी बक्से और चप्पलें बनाना सिखा दिया गया था। जिंदगी किसी तरह चल रही थी, पर वह अक्सर याद करता था कि कभी उसकी आंखें ठीक थीं। तीन साल की उम्र रही होगी, वह घर-दरवाजे पर खूब दौड़ता-भागता था। एक दिन खेल...