बगहा, मार्च 16 -- बगहा, हमारे संवादाता। ' गैस रुठी त माटी के चूल्हा मुस्काइल, अंगना में फिर धुंआ के बादर छाइल। लकड़ी-उपला से सुलगे लागत आग, देगजी में दाल, कड़ाही में लागल साग। सासु सिखावे पतोहु के पुरनका ढंग, एहमे बनत रहे खाना, स्वाद रहे दंग...गैस आईत फिर बदली ई ठौर,तबतक लौट आइल माटी के चूल्हा के दौर' उक्त कविता की पंक्तियां आज के दौर में सटिक बैठ रही है। रसोई गैस सिलेंडर की किल्लत का असर अब आम जनजीवन में साफ दिखाई देने लगा है। शहर के होटलों में जहां कोयले के चूल्हे फिर से जलने लगे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों और बस्तियों में घर-घर मिट्टी के चूल्हों पर लकड़ी और उपले से खाना बन रहा है। गैस संकट ने लोगों को एक बार फिर पुराने दिनों की याद दिला दी है। शहर के कई होटल संचालकों ने गैस नहीं मिलने के कारण कोयले के चूल्हों का सहारा लिया है। वहीं दूसरी ओर ...
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