कानपुर, जून 16 -- मंगलपुर, संवाददाता। भगवान के भक्त व सदाचारी होने के बाद भी जाने-अनजाने में गुरू व मित्र से किए गए छल का दंड मानव को भोगना ही पड़ता है। निष्काम कर्मयोगी व भगवान के परमभक्त होने के बाद भी सुदामा को बाल्यावस्था में अपने मित्र से छिपाकर गुरूमाता के दिए चने खाने के कारण दरिद्रता का दंश मिला। मंगलवार को मंगलपुर कस्बे में भागवत कथा सुनाते हुए आचार्य ने यह बात कही।

कथा का अनुपम अनुभव मंगलपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन आचार्य नवलेश महाराज ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि सुदामा दीनहीन ब्राह्मण नहीं निष्काम कर्मयोगी थे, लेकिन बाल्यावस्था में गुरूमाता के दिए चने अपने मित्र श्रीकृष्ण से छिपाकर खाने के कारण उनको दरिद्रता का दंश मिला। उन्होंने कहा कि सुदामा की मित्रता भगवान के साथ नि:स्वार्थ थी। उन्होंने कभी उनस...