मुंगेर, सितम्बर 13 -- मुंगेर,हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। संन्यास बाहरी वेशभूषा नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और चेतना में बदलाव का नाम है। गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान हो सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक कसौटी व्यक्ति का त्याग, समर्पण, आचरण और सेवा भाव है। अपने 'मैं' से ऊपर उठकर गुरु के संकल्प को जीवन का उद्देश्य बनाना और मानवता के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करना ही संन्यास का वास्तविक अर्थ है। शनिवार को पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में लक्ष्मीनारायण महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर आयोजित संन्यास दिवस समारोह में परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने यह बातें कही। यह भी पढ़ें- मुंगर : गेरुआ वस्त्र संन्यास की पहचान, कसौटी नहीं : स्वामी निरंजनानंदस्वामी सत्यानंद की यात्रा उन्होंने परमगुरु परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के जीवन और उनके संन्यास की यात...