शामली, फरवरी 27 -- जैन मुनि प्रतीक सागर महाराज ने शहर के जैन धर्मशाला में अपने प्रवचनों में कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में गुरुकुल व्यवस्था केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह संपूर्ण जीवन निर्माण का सशक्त माध्यम थी। गुरुकुल में बालकों को शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ श्रम, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्होंने कहा कि जब बालक लगभग चार वर्ष का हो जाता था, तब उसे गुरुकुल भेज दिया जाता था। वहां राजा का पुत्र हो या सामान्य परिवार का बालक, सभी को समान रूप से लकड़ी काटने, गड्ढे खोदने और भिक्षा लाने जैसे कार्य करने पड़ते थे। इसका उद्देश्य अहंकार का नाश करना और समानता की भावना का विकास करना था।कहा कि यद्यपि हम कहते हैं कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं, फिर भी मनुष्य की मनोवृत्ति में भेद दिखाई देता है। प्रत्येक व्...