अंबेडकर नगर, मार्च 1 -- जलालपुर। मरकजे अहले सुन्नत दारुल उलूम निदाये हक जलालपुर के प्रिंसिपल हजरत मौलाना हबीबुर्रहमान नूरी ने एक बयान में कहा कि रमजान का दूसरा अशरा अशरा-ए-मगफिरत कहलाता है। ज्यादा सही है कि इन दस दिनों में बार-बार तौबा और इस्तगफार पढ़ा जाए। जब अल्लाह के बंदे अपने रब को खुश करने के लिए दिल से मगफिरत मांगते हैं तो अल्लाह उनके गुनाहों को माफ कर देता है, चाहे वे समंदर के झाग बराबर ही क्यों न हों। इबादत, तिलावत, खैरात, उमराह, हज, जलसा, जुलूस के साथ-साथ हमें अपने लेन-देन, नीयत, नजर, जबान और बोलचाल, आदतें, व्यवहार, नैतिकता और किरदार को भी बेहतर और ऊंचा करने की जरूरत है। रमजान का महीना हमारी जिंदगी का आईना है। हर साल यह मुबारक महीना हमें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है।
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