पूर्णिया, मार्च 1 -- मीरगंज, संवाददाता।फाल्गुन की आहट के साथ ही कभी गांवों की चौपाल जोगीरा और फगुआ के सुरों से गूंज उठती थी। ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की थाप पर जोगीरा सा रा रा रा की तान ऐसा समां बांधती थी कि पूरा गांव उत्सवमय हो जाता था। होली से कई दिन पूर्व ही रात की बैठकी का दौर शुरू हो जाता था, जिसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग एक साथ बैठकर सामूहिक रूप से फगुआ गाते थे। इन लोकगीतों में हास्य-व्यंग्य के साथ समाज को आईना दिखाने वाले संदेश भी छिपे होते थे। चौपाल केवल गीत-संगीत का मंच नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और संवाद का सशक्त केंद्र थी। यहीं आपसी मतभेद दूर होते, रिश्तों में मिठास घुलती और गांव की सामूहिक संस्कृति सजीव होती थी। समय के बदलते दौर और आधुनिकता की तेज रफ्तार ने इस परंपरा को प्रभावित किया है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जगह अब डीजे और ...
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