बांका, मार्च 2 -- बांका। निज प्रतिनिधि। फागुन का महीना शुरू होते ही कभी गांव की गलियां पारंपरागत होली गीत और जोगीरा की गूंज से चहक उठता था। मगर बदलते समय के साथ सांस्कृतिक रंग अब धीरे-धीरे फीका पडता जा रहा है। पहले शहर में आधुनिकता के कारण परंपरागत होली का स्वर कम हुआ। अब गांव में भी बदलाव साफ नजर आने लगा है। मगही और भेजपुरी लोकधुन पर आधारित जोगीरा, फागुआ और पारंपरिक होली गीत की जगह अब तेज आवाज वाले डीजे और कई बार अश्लील गीतों ने ले लिया हैद्ध जिससे होली का पारिवारिक व सामुदायिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है। हरि किशोर, पंकज कुमार व रामपुकार की माने तो पहले वसंत पंचमी से ही गांव में होली का उत्साह शुरू हो जाता था और गांवों के चौपालों पर फागुन के गीत गूंजने लगते थे। जहां शाम होते ही गांव के सार्वजनिक स्थल, बथान, चौपाल और मंदिर परिसर में मंडली ...
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