वाराणसी, फरवरी 12 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। तुलसीघाट पर गंगा की धाराएं बुधवार देर शाम ज्यादा ही गंभीर रहीं। हवा के झोके भी उन्हें विचलित करने में असमर्थ थे। लहरें मचलतीं तो घाट की सीढ़ियों को थपकी भर देकर लौट जातीं। गहराती रात के साथ यह गंभीरता और गहराई तक पहुंचने लगी। घाट पर बैठे लोग भी इस आनंद की अनुभूति आंखें बंद कर करने लगे। अवसर था हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे पुरानी और गंभीर गायन शैली के उत्सव घ्रुपद मेले का। ध्रुपद तीर्थ के रूप में विख्यात हो चुके तुलसीघाट पर आयोजन की बुधवार पहली निशा थी। वैदिक मंत्रों के जाप से उपजी इस शैली के साधक एक-एक कर मंच को गरिमामय करते रहे और सामने चुनिंदा ही सही लेकिन शास्त्रीय संगीत के आरोह-अवरोध में डूबने को व्याकुल रसिक श्रोता धन्य होते रहे। महाराज बनारस विद्या न्यास की ओर से पांच दिनी आयोजन...