गंगापार, मार्च 18 -- कभी गर्मियों की दोपहर में आंगन के कोने में रखे मटके का ठंडा, मीठा पानी घर की प्यास ही नहीं, मन की तपन भी बुझा देता था। आज वहीं मटका बाजारवाद और बदलती पीढ़ी की बेरुखी के बीच अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में है। यमुनापार इलाके में प्रजापति समाज के हजारों परिवार रहते हैं, जिनमें से लगभग 60 फीसदी परिवार अब भी मटका, दीया और सुकड़ी बनाने के पुश्तैनी काम से जुड़े हैं। लेकिन यह धंधा अब कच्चा ही नहीं, अनिश्चितताओं से भरा हो गया है। गौहनिया के अर्जुन कुम्हार बताते हैं कि पहले लकड़ी के चाक पर मटका बनाया जाता था। करीब तीन हजार रुपए में मिलने वाला यह चाक सस्ता जरूर है, लेकिन मेहनत बहुत मांगता है। समय के साथ बिजली से चलने वाले चाक आए, जिनकी कीमत करीब दस हजार रुपए है। शुरुआत में उम्मीद जगी कि काम आसान होगा, उत्पादन बढ़ेगा लेकिन हकीक...
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