नई दिल्ली, मार्च 11 -- दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे शख्स को अनुशासनात्मक फोर्स का हिस्सा बनने से रोकने को सही माना है जिस पर गंभीर अपराधिक मुकदमा दर्ज हो चुका हैं। हालांकि, यह शख्स इस मामले से बरी हो गया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि अदालत से बाइज्जत बरी होना व परिस्थितियों के कारण साक्ष्यों की कमी से बरी होने में अंतर है। इसलिए साक्ष्यों की खामी के कारण बरी होने को निरपराध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल व न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने युवक की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वह दिल्ली पुलिस जैसी अनुशासनात्मक फोर्स का हिस्सा बनने के लायक नहीं है। वह एक गंभीर अपराध के मामले में आरोपी रहा है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत से बरी होना ही काफी नहीं होता। किसी व्यक्ति को निर्दोष तब माना जाता है जब उसके खिलाफ कोई साक्ष्य ...