वाराणसी, फरवरी 26 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी में मसाने की होली को लेकर छिड़ी बहस में विद्वानों का वर्ग बिल्कुल अलग राय रखता है। उनका मानना है कि इसमें शक नहीं कि बनारसी अपनी अतरंगी हरकतों के कारण चर्चा में रहते हैं लेकिन इसकी आड़ में कुछ भी ऊटपटांग करके उसे बनारस की संस्कृति का नाम नहीं दिया जा सकता। वरिष्ठ सांस्कृतिक समीक्षक पं.अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि काशी के साहित्यकारों ने महाश्मशान को शोक और असह्य वेदना का स्थान चिह्नित किया है। ऐसे स्थान पर नृत्य, नशा और तरह-तरह की नौटंकी स्वीकार नहीं हो सकती। वरिष्ठ समीक्षक डॉ.जितेंद्रनाथ मिश्र कहते हैं कि मणिकर्णिका एक असाधारण और जागृत तीर्थ है। देवी पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव द्वारा तारक मंत्र इसी तीर्थ पर दिया जाता है। ऐसे शुचितापूर्ण स्थान पर नृत्य आदि किसी दृष्टि से शोभा नहीं देता...